प्रधानमंत्री की जान को खतरा या नाटक?

BY- Prakash Sundrasu,

प्रधानमंत्री की ख़ासियत है कि जब-जब वे अप्रिय स्थिति में पड़ते हैं किसी न किसी तरह उनकी जान को ख़तरा पैदा हो जाता है. जब से वे मुख्यमंत्री हुए तब से अब तक कुछ समय के बाद उनकी हत्या की साज़िश की कहानी कही जाने लगती है. लोग गिरफ़्तार किए जाते हैं, पर कुछ साबित नहीं होता. फिर एक रोज़ नए ख़तरे की कहानी सामने आ जाती है.

‘ईश्वर को धन्यवाद कि प्रधानमंत्री सुरक्षित हैं.’ टेलीग्राफ ने तंजिया सुर्खी लगाई.

‘प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान, खालिस्तान समर्थकों और कांग्रेस की साजिश नाकाम कर दी’, भारतीय जनता पार्टी ने एक वीडियो जारी करके दावा किया. वे सच बतलाने के लिए लौट आए. नाटकीय तरीके से वीडियो पूछता है कि अगर प्रधानमंत्री  उस रास्ते आगे बढ़ते तो क्या होता? दंगा? हमला? हिंसा,खून खराबा? प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश?

क्या प्रधानमंत्री पर कोई हमला हुआ? क्या कहीं कोई घेराव हुआ? क्या वे किसी हिंसक भीड़ के बीच से बचकर निकल आए? उन्होंने आखिर पाकिस्तान और खालिस्तान समर्थकों और कांग्रेस की साजिश कैसे नाकाम की?

ये सवाल आज के भारत में बेकार हैं. कोई यह नहीं पूछता कि अपनी पार्टी की राजनीतिक सभा में जो राजनेता जा रहा था, उसका विरोध करने का अधिकार पंजाब के किसानों को क्यों नहीं है? जनतंत्र में जनता को प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है, यह किस संविधान में लिखा है?

प्रधानमंत्री का हर विरोध क्यों उनकी सुरक्षा को खतरा है? दुनिया के हर जनतंत्र में राज्य के प्रमुख के खिलाफ उसके सामने प्रदर्शन होते रहे हैं. अमेरिका में ह्वाइट हाउस के ठीक सामने आप विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं. क्या उससे अमेरिका के राष्ट्रपति की जान को ख़तरा होने का शोर आपने कभी सुना है?

इतना हंगामा क्यों बरपा है? हुआ तो बस यही था न कि नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी की सभा संबोधित करने सड़क के रास्ते जा रहे थे और आगे किसान रास्ता घेरकर बैठे थे? यह विरोध वे किसान आंदोलन के दौरान हुई मौतों का और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे के हाथों हुई किसानों की हत्या का हिसाब लेने की मांग के साथ कर रहे थे. विरोध इसलिए भी कि किसानों की मौतों पर प्रधानमंत्री ने अपने एक राज्यपाल को कहा कि क्या वे उनके लिए मरे थे कि वे कुछ करें!

क्या भारत के संप्रभु मतदाता को अपनी सरकार के मुखिया को पाबंद करने का हक़ नहीं है? यह कौन-सा जनतांत्रिक विधान है कि अगर जनता प्रधानमंत्री के सामने आएगी तो उसकी जान को खतरा हो जाएगा?

लेकिन नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री जनता के ऊपर है. जब वह गुजरे तो सड़क जनता से साफ़ दिखाई पड़नी चाहिए. उसे सिर्फ जयकार सुननी है, विरोध के नारे ईशनिंदा हैं.

चूंकि किसान रास्ता रोककर बैठे थे, प्रधानमंत्री का काफिला एक किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया. पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा कि उनसे कुछ वक्त मांगा गया कि किसानों को हटाया जा सके, उन्हें वैकल्पिक रास्ता बताया गया लेकिन प्रधानमंत्री ने गाड़ी वापस घुमवा दी.

इसे कहा जा रहा है कि वे बचकर आ गए, कुछ भी हो सकता था, कि उन्होंने पाकिस्तान की साजिश नाकाम कर दी. जैसे अपना विरोध कर रही जनता से मुंह चुराकर भाग आना मोर्चा फतह करने की बहादुरी हो.

इस पूरे प्रसंग में सुरक्षा में चूक कहां है? इसमें साजिश कहां है? क्यों सारा मीडिया एक सुर में इसे प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ बता रहा है? क्यों सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को फौरी सुनवाई की प्राथमिकता दे रहा है?

मामला बहुत साफ़ है. पंजाब के मुख्यमंत्री ने  कहा कि असल बात यह थी कि प्रधानमंत्री को खबर मिल गई थी कि सभा में लोग नहीं आ रहे हैं. वहां जाकर खाली मैदान से मालूम हो जाता कि पंजाब में  उनका स्वागत नहीं है. इस बेइज्जती से बचने का एक चतुर तरीका था पूरे मामले को नाटकीय मोड़ देना.

मीडिया तैयार बैठा है. हर अखबार संपादकीय लेख रहा है कि प्रधानमंत्री आखिर प्रधानमंत्री होता है. वह राजनीति से ऊपर होता है आदि आदि!

नरेंद्र मोदी लेकिन कभी प्रधानमंत्री रहे नहीं. वह राज्य के और करदाताओं के पैसे पर पिछले 7 साल से अपनी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार का ही काम करते रहे हैं. उन्हें कभी किसी ने नहीं कहा कि करदाताओं के पैसे से वे उन्हीं के खिलाफ अभियान नहीं चला सकते.

यह भी ध्यान दिलाया गया कि यह भाजपा और इस प्रधानमंत्री की खासियत है कि जब-जब वे अप्रिय स्थिति में पड़ते हैं किसी न किसी तरह उनकी जान को खतरा पैदा हो जाता है. जब से वे गुजरात के मुख्यमंत्री हुए तब से अब तक हर  कुछ समय के बाद उनकी हत्या की साजिश की कहानी कही जाने लगती है. लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, कुछ भी साबित नहीं होता, नए खतरे की साजिश की कहानी सामने आ जाती है.

अभी धर्म संसद,मुसलमान औरतों की नीलामी जैसे मामलों में सरकार की चुप्पी के चलते पूरी दुनिया में नरेंद्र मोदी सरकार की तीखी आलोचना हो रही थी. पंजाब के किसान उनसे नाराज़ हैं ही. इस माहौल को बदलने का एक ही तरीका था: प्रधानमंत्री की जान को खतरे का नाटक!

लेकिन एक प्रसंग और है. वह यही पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश का चुनाव. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के हिंदू मतदाता को खालिस्तानी खतरे का भूत दिखलाने पर वह शायद डर के मारे भाजपा की छाती से चिपक जाए, कोशिश यह है. किसान आंदोलन के दौरान भाजपा ने खालिस्तानी प्रेत को अपने मतदाताओं में ज़िंदा कर दिया है. वह इसका इस्तेमाल करके देश को बचाने के नाम पर वोट बटोरना चाहती है.

दूसरे, इस मामले को इतना भयानक बनाने की कोशिश की जा रही है ताकि पंजाब को किसी तरह संघीय नियंत्रण में ले लिया जाए. सारी संघीय राजकीय संस्थाएं सक्रिय हो गई हैं. ऐसा दिखलाया जा रहा है मानो राज्य उसके मातहत हो. भाजपा के सहयोगी कैप्टन अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर ही डाली है.

इसका लाभ जैसा हमने कहा, बाकी राज्यों में, खासकर उत्तर प्रदेश, खालिस्तान और पाकिस्तान का डरौना खड़ा करके राष्ट्रप्रेमी जनता में सिख द्वेष पैदा करके लिया जाएगा. भाजपा पहले यह कर चुकी है.

वह उत्तर भारत में केरल, तमिलनाडु, बंगाल के खिलाफ प्रचार करती रही है. सिखों को लेकर एक पूर्वाग्रह हिंदुओं के मन में 40 साल से है. इस नाटक से उस पूर्वाग्रह को उकसाने की कोशिश की जा रही है. यह नाटक हास्यास्पद है. हंसा जा सकता था अगर इसके पीछे जनतंत्र के अपहरण का शैतानी दिमाग न होता.

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